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धर्म और ग्रंथ इतना नहीं है जितना देखने और सुनने मे लगता | यह ही परब्रह्म है (सर्वोच्च ब्रह्म है) | यदि ग्रन्थ को केवल जीवन शैली में उतरा जाये तो वह वस्तु पर इतना कारगर न होगा बल्कि ग्रन्थ को इस प्रकार स्वयं में उतरा जाये कि केवल जीवनशैली ही उत्तम न हो बल्कि मुक्ति का साधन हो जाए | और पूर्ण उपयोगी हो |
जिसे तत्वज्ञान कहा है (अद्वैतवादी )
