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Few lines which came to mind for lord Rahu…..
ना शरीर है, ना बदन मेरा,
जहाँ रहूँ, वहीं जमा लूँ अपना डेरा।
भूख की ना कोई सीमा मेरी,
सूर्य-चंद्र को निगलूँ, कर दूँ दुनिया अंधेरी।वक्र है मेरी चाल, वक्र हैं मेरे ख़याल,
गर्व मुझे, जिसने तोड़ा नारायण का मोहिनी मायाजाल।
हे मनुष्य, ये भूल मत जाना,
मैं ही था जिसने अमृत का प्याला चखा था, माना।मैं वो प्रश्न हूँ, जो उत्तर से बड़ा है,
मैं वो पथ हूँ, जो स्वयं मंज़िल बना है।
मेरी आँखों में ना निद्रा का वास,
मैं समय से भी आगे, अनंत का आभास।ना देव, ना दानव कहो, बस ‘मैं’ ही मेरा नाम है,
जिसने सृजन से पहले देखा ब्रह्म का प्रथम संग्राम है।
तप में जला, शापों में ढला, फिर भी अडिग खड़ा हूँ,
ज्ञान की ज्वाला में नित्य स्वयं को गढ़ा हूँ।माँ सरस्वती, मेरी आराध्या को करता हूँ प्रणाम,
चाहता हूँ समझना इस पूरे संसार का ज्ञान।
जो मुझे सुने, देखे, गलत ही ठहराए,
मुझसे घबराए, फिर भी ये भूल जाए —इस कलियुग में जो चाहे राज-सिंहासन पाए,
मेरे बिना वह एक कदम भी ना बढ़ पाए।
मैं वो शक्ति, जिसे तुमने समझा अंधकार,
पर मेरी छाया में ही छिपा है नव-ज्ञान का विचार।मैं विरोध नहीं, संतुलन का कारक हूँ,
सृजन और संहार दोनों का भाग्यधारक हूँ।
कलियुग का नहीं, हर युग का मैं सार हूँ,
अंत नहीं, मैं अनंत का आकार हूँ।1 Comment
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