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हर संयोजन का कुछ न कुछ अर्थ होता है पर यह हमारे ऊपर निर्भर करता ह उससे किस प्रकार उत्तम करना प्रकट करना है या आसान भाषा में कहुँ तो दिशा देने ः जैसे 3rd lord in 8th आपने पैर पे कुल्हाड़ी मारना अपने कला को नस्ट करना होता ह पर यदि इसे बहते विचार को एक ढाँचे मे बैठे तो यदि किसी के अपना जीवन एक आदर्श बनाना हो तो स्वयं की इच्छाओं, कर्म, अनेक भावों, कलाओ, आदि को पृथ्वी रुपी हवनकुण्ड मे आहुति देने पड़ते ह ताकि स्वयं को मर्यादा मे रख सकी और उससे प्रकट ज्ञान रूपी जल प्रकट कर सके अध्यात्मिक रुपया वायु से there comes the uttrashada जो यही ऋषि मुनि संयासी देव करते आये आपको क्या लगता उनका असीमित ज्ञान इन किताबो मै “समा ने मैं समर्थ था” हर समय उनके भीतरर वह ज्ञान प्रकट होता ह और नस्ट भी और प्रत्येक कला प्रत्येक क्षण
इसलिये ऐसे सिद्धो, देवताओ का सामान करना आवश्यक ः इसलिए नही की there is always a big fish समर्पण के भाव से
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